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येशू –केवल एक प्रेषित?

येशू ने स्पष्ट किया था कि वह एक प्रेषित से बढकर हैं, वह भविष्यकथनों की पूर्ती और संपूर्णता हैं, और संसार का रक्षक हैं। अगर वह केवल एक सच्चे प्रेषित ही होते, तो वह वे सारी बातें कभी न कहते जो उन्होंने अपने बारे मं कही हैं:

“यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा।" (यूहनना 11, 25-26)

“मैं मार्ग हूँ, सत्य हूँ, और जीवन हूँ. मेरे बिना कोई भी दूर नहीं आ सकता’’ (यूहनना 14, 6).

"क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊंगा।" (यूहनना 6, 40)

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येशू ने जो शब्द कहे हैं, उन शब्दों के साक्षी उनके शिष्य रहे हैं जो उनके साथ कई वर्षों तक रहे हैं और उन शिष्यों ने उन शब्दों को प्रमाणित किया हैं। वह शिष्य उन शक्तीशाली चमत्कार और उपचारों के भी साक्षी रहे हैं और उन्होंने उसे भी प्रमाणित किया हैं, जो चमत्कार और उपचार येशू ने लोगों को क्लेश और व्याधी से मुक्ती देने के लिए किए थे। वह सब नये उपदेश में; उनके मॅथ्यु, मार्क, और जॉन इन शिष्यों के अनुसार उपदेशों में बताया गया हैं।

यह पुछना चाहिए कि; एक व्यक्ती का सबसे अच्छा परिचय किसे होगा? वो जो उसके साथ कई वर्षों तक रहा और उसने जो कहा, जो किया इन सबका साक्षी रहा उसे? या वो जो उसके पश्चात सैकडों वर्षों के बाद आया और जिसने वह सब नहीं देखा उसे?


[येशू (ईसा) – भगवान के शब्द]